Analysis: बीजेपी और कांग्रेस में क्या है फर्क, आखिर भाजपा ने क्यों दिया ‘प्लान 2047’?

By Pradesh Times Sunday, June 09 19 12:00:00

Analysis: बीजेपी और कांग्रेस में क्या है फर्क, आखिर भाजपा ने क्यों दिया ‘प्लान 2047’?

बीजेपी और कांग्रेस में क्या फर्क है? क्या दोनों के बीच वही फर्क है जो पचास और साठ के दशक में कांग्रेस और विपक्ष में हुआ करता था? आईए समझते हैं।

नई दिल्ली: बीजेपी के महासचिव राम माधव ने एक बड़ी राजनीतिक भविष्यवाणी की है। राम माधव का कहना है कि बीजेपी 2047 तक सत्ता में रहेगी। यानी कम-से-कम अभी और 28 साल। अगर ऐसा हुआ, तो देश पर 1947 से 1977 तक लगातार 30 साल शासन करने का कांग्रेस का रिकॉर्ड भी टूट जाएगा। इस रिकॉर्ड के टूटने की बात भी राम माधव कह रहे हैं। उनके ऐसा कहने के पीछे तीन वजहें हो सकती हैं।

पहली: यह बीजेपी या फिर राम माधव का अति-आत्मविश्वास हो सकता है।

दूसरी: सामने दिख रही विकल्पहीनता से बीजेपी में ऐसा भरोसा पैदा हुआ हो।

तीसरी: बीजेपी ने देश के लिए इतना बेहतर एजेंडा बना रखा हो कि जनता उसे बार-बार मौके देने के लिए बाध्य होगी।

अगर स्थिति तीसरी है, तो इसमें देश का ही भला है। जबकि अगर स्थिति दूसरी वाली है, तो यह देश के लिए ठीक नहीं है। और अगर स्थिति पहली बाली है, तो यह खुद बीजेपी के लिए शुभ नहीं है। वैसे तो राजनीति में चीजें बड़ी जल्दी बदलती हैं, लेकिन राम माधव के 28 साल के दावे को नजरअंदाज भी करें, तो आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष (कांग्रेस) के लिए सत्ता में वापसी की कोई मजबूत वजह भी नहीं दिखती। जबकि बीजेपी एक चुनाव में जीत हासिल करते ही अगले चुनाव के लिए जुट जा रही है।

राम माधव के बयान के अगले ही दिन प्रधानमंत्री केरल में होते हैं। चुनावी नतीजों के लिहाज से कांग्रेस के लिए सबसे अच्छे और बीजेपी के लिए सबसे खराब रहे केरल में मोदी कहते हैं- नतीजों के बाद हमारे लिए सब एक हैं। जैसे काशी वैसे केरल। यही फर्क है, जिसकी बिना पर राम माधव और उन जैसी सोच के शायद कई लोग (गैर राजनीतिक भी) इस वक्त हम अपने बीच देख सकते हैं।

ऑपरेशन बंगाल भी एक उदाहरण है

आमचुनाव में 42 में से 18 सीटें जीतकर टीएमसी के सीने पर चढ़ बैठी बीजेपी ने 23 मई के बाद भी एक पल के लिए चैन की सांस नहीं ली। टीएमसी के जत्थे आते रहे, कमल खिलाने की कसमें खाते रहे। लगता नहीं कि ये सिलसिला दो साल बाद होने वाले विधानसभा चुनावों तक थमने वाला है। ममता बनर्जी के पास कुछ कर गुजरने के लिए दो साल का वक्त बाकी है, लेकिन उनके खेमे और सबसे ज्यादा खुद दीदी के अंदर दिख रही बेचैनी बीजेपी का काम और आसान करती नजर आ रही है। प्रशांत किशोर की तैनाती इस बात का खुला कबूलनामा है कि ममता बीजेपी रूपी खतरे को अपनी सत्ता के लिए कितना गंभीर मान रही है।

बीजेपी का बैकअप प्लान

2017 के यूपी विधानसभा चुनाव के बाद बने राजनीतिक हालात में तय हो गया था कि राज्य में बीजेपी की सीटें घटने से कोई रोक नहीं सकता। पार्टी ने इसकी भरपाई के लिए बैकअप प्लान तय किया। न सिर्फ उनका प्लान कारगर रहा, बल्कि पार्टी की झोली में 2014 से भी ज्यादा सीटें आ गिरीं। एक बार फिर वैसी ही योजना बनाती हुई बीजेपी अभी से दिख रही है। कांग्रेस और लेफ्ट को गंभीरता से सोचना होगा कि कहीं 2024 आते-आते केरल का किला पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा की तरह भगवा रथ के लिए अपने दरवाजे न खोल दे।

बीजेपी से ठीक उलट कांग्रेस की स्थिति

राजनीति की अब तक की परिपाटी यही रही है कि जीतने वाला कुछ वक्त तक जीत का जश्न मनाता है, तो हारने वाला मंथन कर रहा होता है। इस बार हालात बिल्कुल अलग है। जीतने वाला अभी से राज्यों के विधानसभा चुनावों और फिर 2024 के आमचुनाव में जीत की रणनीति बनाने में जुट गया है, तो हारने वाली एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी (कांग्रेस) सदमा-ग्रस्त है।

सोनिया गांधी कांग्रेस संसदीय दल की नेता चुनी जा चुकी हैं। राहुल गांधी वायनाड से नफरत के जवाब में प्यार के अपने फेल हो चुके संदेश को दोहराते नजर आ चुके हैं। इसके साथ ही अब अनौपचारिक रूप से यह तय हो चुका है कि राहुल गांधी के हाथ में ही कांग्रेस की कमान रहनी है।

पार्टी की एक और करारी हार के बाद पिछले दिनों हुई कांग्रेस बैठकों से कई तरह की बातें छन-छनकर बाहर आती रहीं। इन बातों के निष्कर्ष में जाएं तो-

  1. राहुल गांधी पार्टी के कई सीनियर नेताओं से खासे नाराज हैं।
  2. राहुल को लगता है कि इन सीनियर नेताओं को पार्टी से ज्यादा परिवार की चिंता है।
  3. नेहरू-गांधी परिवार को लगता है कि कुछ नेता पीठ पीछे राहुल के लिए गड्ढे खोदते हैं।
  4. कई नेताओं को कांग्रेस ने जितना कुछ दिया है, वे बदले में पार्टी को कुछ भी देने की स्थिति में नहीं हैं।

राहुल का ये आकलन शत-प्रतिशत सही हो सकता है। लेकिन ये सब बताने का उन्होंने जो तरीका अपनाया, उससे न सिर्फ उनकी पार्टी के सीनियर नेताओं से नाराजगी बेवजह सबके सामने जाहिर हुई, बल्कि बहुत ही प्रभावी तरीक से यह संदेश भी गया कि जैसे राहुल ने कांग्रेस को उबार पाने में हाथ खड़े कर दिए हों। अगर सेनापति ही हथियार डालता दिखे, तो फिर फौज उसके पीछे किस आत्मविश्वास से खड़ी रहेगी? तेलंगाना में कांग्रेस के 18 में से 12 विधायक पार्टी को बाय-बाय कर चुके हैं। राजस्थान में नंबर वन और टू आमने-सामने हैं। पंजाब में सीएम और सीएम इन वेटिंग एक दूसरे को देखना तक नहीं चाहते। कई और राज्यों में घर के अंदर असंतोष का लैंडमाइन कब विद्रोह का दावानल बनकर फूट पड़ेगा कहा नहीं जा सकता। कुल मिलाकर कांग्रेस की हार से ज्यादा खतरनाक हार पर हाहाकार है। जिसे हवा देने का काम खुद राहुल गांधी ने भी निराशा के अपने खुले प्रदर्शन के जरिये किया है।

महाराष्ट्र-हरियाणा के लिए प्लान क्या है?

महाराष्ट्र और हरियाणा दो ऐसे राज्य हैं जहां कांग्रेस के लिए बहुत कुछ दांव पर है। महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी का सीधा मुकाबला एक बार फिर बीजेपी-शिवसेना से है। लोकसभा चुनाव में यूपीए का प्रदर्शन उनके लिए हौसला तोड़ने वाला रहा है। और समय भी बेहद कम है।

वहीं, हरियाणा में कांग्रेस का दावा और मुगालता था कि 2014 के मुकाबले उनकी स्थिति काफी सुधरेगी। लेकिन सुधरना तो दूर, उल्टे और बिगड़ गई। 2014 में हरियाणा की 10 में से 7 सीटें जीतने वाली बीजेपी इस बार क्लीन स्वीप कर गई। उससे पहले उपचुनाव में रणदीप सुरजेवाला की करार हार ने पहले ही काफी कुछ कहानी बयां कर दी थी।

कांग्रेस की जो हालत दिख रही है, उससे यही लगता है कि कम-से-कम 2019 से लेकर 2020 के शुरुआती महीनों तक होने वाले विधानसभा चुनावों में पार्टी शायद ही उठकर दोबारा खड़ी हो सके।

झारखंड में बीजेपी की आक्रामक रणनीति

कांग्रेस और उनके सहयोगियों को सोचना होगा कि बीजेपी की आक्रामक रणनीति का उनके पास क्या जवाब है? जिस झारखंड को लोकसभा चुनाव के दौरान यूपीए अपने काबू में समझ रही थी, वहां भी उनकी बुरी गत हुई। 14 में से 12 सीटें जीतने के बाद बीजेपी एडवांस विधानसभा चुनाव की प्लानिंग कर चुकी है। आसार इसी बात के हैं कि राज्य में महाराष्ट्र और झारखंड के साथ चुनाव करा लिए जाएं।

मध्य प्रदेश-राजस्थान-छत्तीसगढ़ से खतरनाक संकेत और संदेश

इन तीन राज्यों को बीजेपी की लंबी सत्ता के दौर से खींचकर कांग्रेस अपनी झोली में लेकर आई थी। लोकसभा चुनाव होने तक यहां कांग्रेसी शासन के बमुश्किल 6 महीने बीते थे। इतने कम समय में कांग्रेस की जो धुलाई राजस्थान और मध्य प्रदेश में हुई वह चौंका गई। हद तो ये कि जिस छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने एकतरफा जीत हासिल की थी वहां भी बीजेपी 11 में से 9 सीटें ले गई।

ये कुछ उदाहरण उस फर्क को दिखाने के लिए, जिसके आधार पर शायद राम माधव कहते हैं कि बीजेपी 2047 तक तो केंद्र की सत्ता से कहीं नहीं जा रही। और जिसकी वजह प्रधानमंत्री मोदी काशी और केरल को एक बराबर बताकर समझाते हैं। वंश परंपरा से आने वाले राहुल वंशवाद का विरोध करते हुए उतने स्वीकार्य नहीं लग सकते, जितने कि मजबूत विकल्पों और तैयारियों के साथ आने पर हो सकते हैं।

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