मुंबई में रहते यहूदियों का स्वर्णिम इतिहास

By Pradesh Times Friday, February 23 18 12:00:00

मुंबई में रहते यहूदियों का स्वर्णिम इतिहास

कालाघोड़ा के रेंपर्ट रो में बगदादी यहूदियों का एक उपासना स्थल है- केनेसेट इलियाहू सेनेगॉग। आसमानी नीले रंग की एक तीन मंजिला भव्य इमारत। उस गली से गुजरते हुए 1884 में बनी विक्टोरियन वास्तुशिल्प की इस इमारत को देखकर कदम सहसा ठिठक जाते हैं। इस सेनेगॉग के विशाल हॉल के मध्य में वह वेदीविशाल खिड़कियों के कांच पर वह रंग-बिरंगी सजावटऊंची छतवे दीवारेंवे बालकनियांवह डेढ़ सदी पुराना फर्नीचरकिसी बीते समय की याद दिलाते वे लैंप और वह समग्र वातावरण- स्थापत्य और इतिहास की वह मिलीजुली गंध इस घोर वर्तमान में वहां जैसे किसी जादुई समय को रचती सी महसूस होती है। यही एहसास भायखला में डेविड ससून द्वारा 1861 में बनाए यहूदियों के उस विशाल मेगन डेविड सेनेगॉग के आगे से गुजरते हुए होता है।

हमारे इस कॉस्मोपॉलिटन शहर का लैंडस्केप बहुत सारे रंगों और रेखाओं से निर्मित हुआ है। इनमें कुछ रंग और रेखाएं चटख हैं, तो कुछ धुंधले और धूसर। यहूदियों की यहां एक बहुत पुरानी दुनिया है। लगभग किसी मिथकीय समय की याद दिलाती हुई। बंबई (मुंबई) शहर में बसे इन यहूदियों के दो समुदाय हैं- बेन इजरायल यहूदी और बगदादी यहूदी। बगदादी यहूदियों के इस शहर में आगमन का इतिहास तो केवल दो सौ वर्ष पुराना है, जब वे 18 वीं सदी में विकसित होते औपनिवेशिक शहर मुंबई में आए।

ये बगदादी यहूदी अरबी बोलने वाले पश्चिम एशिया से आए लोग थे, जो तुर्की मुसलमानों के उत्पीड़न से त्रस्त होकर इराक, सीरिया, ईरान और आसपास के इलाकों से इस शहर में आए थे। लेकिन बेन इजरायल (इजरायल की संतान) नामक यहूदी तो यहां छठी शताब्दी में ही आ गए थे, जब इस शहर का कोई नामोनिशान तक नहीं था। वे इस शहर के आदिम रहिवासियों में से हैं। वे यहूदी यरुशलम के सबसे प्राचीन यहूदी समुदायों में गिने जाते हैं और पिछले 2 हजार साल से भारत में कोंकण इलाके में इसकी उपस्थिति रही है। इस लंबी अवधि में वे यहां के स्थानीय रंग में पूरी तरह से एकाकार हो चुके हैं।

समुदायों के विस्थापन, प्रवास और पुनर्स्थापन के कुछ मौखिक इतिहास होते हैं। दुनिया की शायद ही कोई ऐसी संस्कृति हो- जीवित या मृत, जो कोई कहानी न कहती हो। एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को अपनी कथाओं और उनमें छिपी स्मृतियों को हस्तांतरित करती जाती है। यह बात किसी महाकाव्य के आख्यान की तरह लगती है कि इन बेन इजरायल यहूदियों के पूर्वजों का एक जहाज आज से 2 हजार साल पहले पश्चिम से इस तरफ आते हुए कोंकण तट के पास क्षतिग्रस्त हो गया था।

कोई नहीं जानता कि उस जहाज का गंतव्य क्या था। उस डूबते जहाज के बचे हुए सात यहूदी परिवारों ने अलीबाग के पास नवगांव में शरण ली थी। कोंकण तट के गांवों में ये लोग शनिवार तेली के रूप में जाने जाते रहे, क्योंकि ये बीजों से तेल पेरने का काम करते थे। शनिवार इनका विश्राम-दिवस होता था। इतने लंबे अर्से में कोंकण इलाके की जीवन पद्धति में उनका इस तरह से विलयन हुआ कि कोंकणी नामों और मराठी भाषा तक को उन्होंने अपना लिया, पर फिर भी पिछले दो हजार सालों में अपनी सांस्कृतिक पहचान, स्मृति, धार्मिक आस्था और विश्वासों को बनाए रखने का इनका इतिहास चकित करता है क्योंकि ये इजरायल की अपनी मूल जमीन से लगभग कट चुके थे।

18 वीं सदी में जब मुंबई शहर विकसित होने लगा, तो अलीबाग और आसपास के इलाकों से एक बड़ी संख्या में इन यहूदियों का यहां इस शहर में आगमन हुआ। मुंबई में यहूदियों के 10 सेनेगॉग हैं। इस शहर में यहूदी इतिहास के विशेषज्ञ शउल सपिर अपनी चर्चित पुस्तक बॉम्बे: एक्सप्लोरिंग द जुइस अर्बन हेरिटेज में लिखते हैं कि 1950 के दशक में मुंबई में 25 हजार बेन इजरायल और 6000 हजार बगदादी यहूदी थे। 1948 में इजरायल राष्ट्र बनने के बाद अधिकांश यहूदी यहां से चले गए। आज मुंबई में इनकी संख्या घटकर सिर्फ 2200 के आसपास रह गई है। ज्यादातर यहूदी अब भायखला और ठाणे इलाके में हैं।

मुंबई का सबसे पुराना सेनेगॉग शार हाराहमीन (गेट ऑफ मर्सी) है, जो सैमुअल एजेकेल दिवेकर नामक बेन इजरायल यहूदी ने 1796 में मांडवी इलाके की सैमुअल स्ट्रीट में बनवाया था। कुर्ला में सीएसटी रोड के उस भीड़-भाड़ वाले इलाके में बेन इजरायली समुदाय का वह पुराना एक छोटा-सा प्रार्थना-घर लगभग एक अचरज की तरह लगता है।

1832 में एक अत्यंत संपन्न यहूदी व्यापारी डेविड ससून और उसके साथ कुछ दूसरे बगदादी कारोबारी यहूदियों का आगमन इस विकसित होते शहर के समूचे लैंडस्केप को बदल देता है। डेविड ससून ने पारसी उद्योगपतियों की तरह ही 18 वीं सदी की मुंबई में कारोबार और आधुनिक गतिविधियों की नींव रखी। वे इस शहर में 11 मिलों के मालिक थे। उनका कारोबार समूचे भारत के अलावा पश्चिम एशिया, चीन, हॉन्ग कॉन्ग, जापान, म्यांमार, सिंगापुर और ग्रेट ब्रिटेन तक फैला हुआ था। लेकिन उन्हें उनके आधुनिकता बोध और जनकल्याण गतिविधियों के कारण आज तक याद किया जाता है।

डेविड ससून की विरासत जे.जे. अस्पताल परिसर में डेविड ससून अस्पताल, भायखला में जेकब ससून स्कूल, मसीना अस्पताल, केनेसेट इल्याहू सेनेगॉग, मेगन डेविड सेनेगॉग, एल्फिंस्टन टेक्निकल स्कूल, डेविड ससून लायब्रेरी, फ्लोरा फाउंटेन का वास्तुशिल्प, रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस की इमारत, विक्टोरिया गार्डन में क्लॉक टॉवर, अल्बर्ट म्यूजियम, माटुंगा का डेविड ससून इंडस्ट्रियल इंस्टीट्यूट एंड रेफोर्मेटरी, बॉम्बे फ्लाइंग क्लब, निवारा ओल्ड एज होम आदि हैं।

1911 में गेट ऑफ इंडिया की उस प्रसिद्ध इमारत के निर्माण में सबसे बड़ा योगदान डेविड ससून परिवार का था। इसी के साथ 1884 में स्थापित एंग्लो-जुइस प्रेस और डोरेश टोव ले-अम्मो जैसे हिब्रू-अरबी साप्ताहिक के साथ इस शहर में यहूदी इतिहास का एक विस्मृत अध्याय अरबी, हिब्रू, मराठी और अंग्रेजी भाषाओं में प्रकाशित उन पुराने यहूदी अखबारों और यहूदी प्रकाशन उद्योग का भी है।

इस शहर में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में यहूदी समुदाय के वे एक से एक चमकते सितारे रहे हैं, जिनमें से हर एक के व्यक्तित्व पर एक स्वतंत्र लेख लिखा जा सकता है- डॉक्टर, वकील, प्रशासनिक अधिकारी, सैनिक, अफसर, बुद्धिजीवी, लेखक, कलाकार आदि सभी क्षेत्रों के लोग। 1965 के भारत-पाक युद्ध के समय नौसेना की पश्चिमी कमान के वाइस एडमिरल बेंजामिन सैमसन, प्रख्यात डॉक्टर और मुंबई की मेयर एलिजा मोसेस (1937-38), सूतिका विद्या विशेषज्ञ और कामा अस्पताल की प्रमुख डॉ. झेरुशा जिहार्द (1928-1949), अंग्रेजी के प्रसिद्ध कवि निसिम एजेकेल, फिल्म अभिनेत्री सुलोचना (रूबी मेयर्स), अभिनेत्री नादिरा (फ्लोरेंस एजेकेल) चरित्र अभिनेता डेविड अब्राहम, प्रसिद्ध वृत्तचित्र निर्माता एजरा मीर, भरतनाट्यम की प्रख्यात कलाकार लीला सेम्सन आदि कितने ही प्रख्यात लोग।

हम आज समय के राजमार्ग पर एक तेज भागती हुई बदहवासी में हैं। लेकिन समुदायों के कुछ विस्मृत इतिहास, कुछ बिखरे हुए संकेत, कुछ छूटे हुए चिह्न, मंडराते हुए किस्से, कुछ उलझे हुए सूत्र और वे झीने से हाशिए हमेशा ही हमें अपनी ओर बुलाते हैं। वह सब जिनमें गुंफित स्मृतियों की कुछ पगडंडियां हैं और वे अंतहीन प्रतीक्षा में खड़े दरवाजे, जिनमें एक बीते हुए समय के रहस्यलोक छिपे हुए हैं। समय के थपेड़ों में हम इस विगत को कितना महत्व देते हैं, यह हम पर निर्भर है।

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